दीपावली के मौकेपर लोगों मेंजो उत्साहनजर आता है, उसके पीछे कईकारण हैं. फुलझड़ी-पटाखे तो केवलक्षणिक सुख हीदे सकते हैं. असली सुख तोहै नीरोग काया, जिस पाने केबाद ही कुछअन्य सुखका लाभ महसूसकिया जा सकताहै.
धन के चक्करमेंसेहतगौण!
धनतेरस के मौकेपर ज्यादातरलोग सोना-चांदी, धन-वैभव अपनेघर लाने मेंज्यादा तत्परता दिखातेहैं और सेहतको ही भूलजाते हैं. होनातो यह चाहिएकि धनतेरस परआरोग्य केदेवता धन्वंतरी कीपूजा-अर्चना कीजाए और दैनिकजीवन में संयम-नियम आदिका पालन कियाजाए.
स्वास्थ्यसेहीमिलेंगीलक्ष्मी
जिस प्रकार देवी लक्ष्मीसागर मंथन सेउत्पन्न हुई थीं, उसी प्रकार भगवानधन्वंतरी भी अमृतकलश के साथसागर मंथन सेउत्पन्न हुए हैं. देवी लक्ष्मी हालांकिकी धन देवीहैं, परन्तु उनकीकृपा प्राप्त करनेके लिए स्वास्थ्य औरलम्बी आयु भीचाहिए. यही कारणहै दीपावली केपहले, यानी धनतेरससे ही दीपामालाएंसजने लगती हैं.
त्रयोदशी के दिनधन्वंतरीकाजन्म
कार्तिक कृष्ण पक्ष कीत्रयोदशी तिथि केदिन ही धन्वंतरीका जन्म हुआथा, इसलिए इसतिथि को धनतेरसमनाया जाता है. धन्वंतरी जब प्रकटहुए थे, तोउनके हाथों मेंअमृत से भराकलश था. भगवानधन्वंतरी चूंकि कलश लेकरप्रकट हुए थे, इसलिए ही इसअवसर पर बर्तनखरीदने की परम्पराहै. कहीं-कहींलोक मान्यता केअनुसार यह भीकहा जाता हैकि इस दिनखरीददारी करने सेउसमें तेरह गुणावृद्धि होती है. इस अवसर परधनिया के बीजखरीद कर भीलोग घर मेंरखते हैं. दीपावलीके बाद इनबीजों को लोगअपने बाग-बगीचोंमें या खेतोंमें बोते हैं.
धन्वंतरी के बारेमेंमान्यताएं
1. धन्वंतरीको हिन्दू धर्ममें देवताओं केवैद्य माना जाताहै. ये एकमहान चिकित्सक थे, जिन्हें देव पदप्राप्त हुआ. हिन्दूधार्मिक मान्यताओं के अनुसारये भगवान विष्णुके अवतार समझेजाते हैं. इनकापृथ्वी लोक मेंअवतरण समुद्र मंथनके समय हुआथा. शरद पूर्णिमाको चंद्रमा, कार्तिकद्वादशी को कामधेनुगाय, त्रयोदशी कोधन्वंतरी, चतुर्दशी को कालीमाता और अमावस्याको भगवती लक्ष्मीजी का सागरसे प्रादुर्भाव हुआथा. इसीलिये दीपावलीके दो दिनपूर्व धनतेरस कोभगवान धन्वंतरी काजन्म धनतेरस केरूप में मनायाजाता है. इसीदिन इन्होंने आयुर्वेदका भी प्रादुर्भावकिया था.
2. इन्हें भगवानविष्णु का रूपकहते हैं, जिनकीचार भुजायें हैं. ऊपर की दोंनोंभुजाओं में शंखऔर चक्र धारणकिये हुए हैं, जबकि दो अन्यभुजाओं मे सेएक में जलूकाऔर औषध तथादूसरे मे अमृतकलश लिये हुयेहैं. इनका प्रियधातु पीतल मानाजाता है. इसीलियेधनतेरस को पीतलआदि के बर्तनखरीदने की परंपराभी है.
3. इन्हें आयुर्वेदकी चिकित्सा करनेंवाले वैद्य आरोग्यका देवता कहतेहैं. इन्होंने हीअमृतमय औषधियों की खोजकी थी. इनकेवंश में दिवोदासहुए, जिन्होंने 'शल्यचिकित्सा' का विश्वका पहला विद्यालयकाशी में स्थापितकिया जिसके प्रधानाचार्यसुश्रुत बनाये गए थे. उन्होंने ही सुश्रुतसंहिता लिखी थी. सुश्रुत विश्व के पहलेसर्जन थे. दीपावलीके अवसर परकार्तिक त्रयोदशी-धनतेरस कोभगवान धन्वंतरी कीपूजा करते हैं.
धनतेरस का महत्व:
1. ऐसा माना जाताहै कि इसदिन नए उपहार, सिक्का, बर्तन व गहनोंकी खरीदारी करनाशुभ रहता है. शुभ मुहूर्त समयमें पूजन करनेके साथ सातधान्यों की पूजाकी जाती है. सात धान्य गेहूं, उडद, मूंग, चना, जौ, चावल औरमसूर है. सातधान्यों के साथही पूजन सामग्रीमें विशेष रुपसे स्वर्णपुष्पा केपुष्प से भगवतीका पूजन करनालाभकारी रहता है. इस दिन पूजामें भोग लगानेके लिये नैवेद्यके रुप मेंश्वेत मिष्ठान्न काप्रयोग किया जाताहै. साथ हीइस दिन स्थिरलक्ष्मी का पूजनकरने का विशेषमहत्व है.
2. धन त्रयोदशी के दिनदेव धनवंतरी देवका जन्म हुआथा. धनवंतरी देव, देवताओं के चिकित्सकोंके देव है. यही कारण हैकि इस दिनचिकित्सा जगत मेंबडी-बडी योजनाएंप्रारम्भ की जातीहै. धनतेरस केदिन चांदी खरीदनाशुभ रहता है.
धनतेरस के मौकेपरक्याखरीदें:
1. लक्ष्मीजी व गणेशजी की चांदीकी प्रतिमाओं कोइस दिन घरलाना, घर- कार्यालय, व्यापारिक संस्थाओं में धन, सफलता व उन्नतिको बढाता है.
2. धनतेरस के दिनचांदी खरीदने कीभी प्रथा है. इसके पीछे यहकारण माना जाताहै कि यहचन्द्रमा का प्रतीकहै जो शीतलताप्रदान करता हैऔर मन मेंसंतोष रूपी धनका वास होताहै. संतोष कोसबसे बड़ा धनकहा गया है. जिसके पास संतोषहै वह स्वस्थहै, सुखी हैऔर वही सबसेधनवान है.
3. भगवान धन्वन्तरी जो चिकित्साके देवता भीहैं, उनसे स्वास्थ्यऔर सेहत कीकामना की जातीहै. लोग इसदिन ही दीपावलीकी रात लक्ष्मीगणेश की पूजाहेतु मूर्ति भीखरीदते हैं.
धनतेरस के दिनक्याकरें:
1. इस दिन धन्वंतरिका पूजन करें.
2. नवीन झाडू एवंसूपड़ा खरीदकर उनकापूजन करें.
3. सायंकालदीपक प्रज्वलित करघर, दुकान आदिको श्रृंगारित करें.
4. मंदिर, गोशाला, नदी केघाट, कुओं, तालाब, बगीचों में भीदीपक लगाएं.
5. यथाशक्तितांबे, पीतल, चांदी केगृह-उपयोगी नवीनबर्तन और जेवरखरीदना चाहिए.
6. हल जुती मिट्टीको दूध मेंभिगोकर उसमें सेमर कीशाखा डालकर तीनबार अपने शरीरपर फेरें.
7. कार्तिकस्नान करके प्रदोषकाल में घाट, गौशाला, बावड़ी, कुआँ, मंदिरआदि स्थानों परतीन दिन तकदीपक जलाएं.
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