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Thursday, 14 November 2013

गुरुवार व्रतकथा

प्राचीन समय कीबात है. किसीराज्य में एकबड़ा प्रतापी तथादानी राजा राज्यकरता था. वहप्रत्येक गुरूवार को व्रतरखता एवं भूखेऔर गरीबों कोदान देकर पुण्यप्राप्त करता थापरन्तु यह बातउसकी रानी कोअच्छा नहीं लगताथा. वह तो व्रत करतीथी और ही किसी कोएक भी पैसादान में देतीथी और राजाको भी ऐसाकरने से मनाकरती थी.
एक समय कीबात है, राजाशिकार खेलने कोवन को चलेगए थे. घरपर रानी औरदासी थी. उसीसमय गुरु वृहस्पतिदेवसाधु का रूपधारण कर राजाके दरवाजे परभिक्षा मांगने को आए. साधु ने जबरानी से भिक्षामांगी तो वहकहने लगी, हेसाधु महाराज, मैंइस दान औरपुण्य से तंग गई हूं. आप कोई ऐसाउपाय बताएं, जिससेकि सारा धननष्ट हो जाएऔर मैं आरामसे रह सकूं.
वृहस्पतिदेवने कहा, हेदेवी, तुम बड़ीविचित्र हो, संतानऔर धन सेकोई दुखी होताहै. अगर अधिकधन है तोइसे शुभ कार्योंमें लगाओ, कुवांरीकन्याओं का विवाहकराओ, विद्यालय औरबाग़-बगीचे कानिर्माण कराओ, जिससे तुम्हारेदोनों लोक सुधरें, परन्तु साधु कीइन बातों सेरानी को ख़ुशीनहीं हुई. उसनेकहा- मुझे ऐसेधन की आवश्यकतानहीं है, जिसेमैं दान दूंऔर जिसे संभालनेमें मेरा सारासमय नष्ट होजाए.
तब साधु नेकहा- यदि तुम्हारीऐसी इच्छा हैतो मैं जैसातुम्हें बताता हूं तुमवैसा ही करना. वृहस्पतिवार के दिनतुम घर कोगोबर से लीपना, अपने केशों कोपीली मिटटी सेधोना, केशों कोधोते समय स्नानकरना, राजा सेहजामत बनाने कोकहना, भोजन मेंमांस मदिरा खाना, कपड़ा धोबी केयहां धुलने डालना. इस प्रकार सातवृहस्पतिवार करने सेतुम्हारा समस्त धन नष्टहो जाएगा. इतनाकहकर साधु रुपीवृहस्पतिदेव अंतर्ध्यान हो गए.
साधु के कहेअनुसार करते हुएरानी को केवलतीन वृहस्पतिवार हीबीते थे किउसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट होगई. भोजन केलिए राजा कापरिवार तरसने लगा. तबएक दिन राजारानी से बोला- हे रानी, तुमयहीं रहो, मैंदूसरे देश कोजाता हूं, क्योंकियहां पर सभीलोग मुझे जानतेहैं. इसलिए मैंकोई छोटा कार्यनहीं कर सकता. ऐसा कहकर राजापरदेश चला गया. वहां वह जंगलसे लकड़ी काटकरलाता और शहरमें बेचता. इसतरह वह अपनाजीवन व्यतीत करनेलगा. इधर, राजाके परदेश जातेही रानी औरदासी दुखी रहनेलगी.
एक बार जबरानी और दासीको सात दिनतक बिना भोजनके रहना पड़ा, तो रानी नेअपनी दासी सेकहा- हे दासी, पास ही केनगर में मेरीबहन रहती है. वह बड़ी धनवानहै. तू उसकेपास जा औरकुछ ले ताकि थोड़ा-बहुतगुजर-बसर होजाए. दासी रानीके बहन केपास गई. उसदिन वृहस्पतिवार थाऔर रानी कीबहन उस समयवृहस्पतिवार व्रत कीकथा सुन रहीथी. दासी नेरानी की बहनको अपनी रानीका सन्देश दिया, लेकिन रानी कीबड़ी बहन नेकोई उत्तर नहींदिया. जब दासीको रानी कीबहन से कोईउत्तर नहीं मिलातो वह बहुतदुखी हुई औरउसे क्रोध भीआया. दासी नेवापस आकर रानीको सारी बातबता दी. सुनकररानी ने अपनेभाग्य को कोसा. उधर, रानी कीबहन ने सोचाकि मेरी बहनकी दासी आईथी, परन्तु मैंउससे नहीं बोली, इससे वह बहुतदुखी हुई होगी. कथा सुनकर औरपूजन समाप्त करवह अपनी बहनके घर आईऔर कहने लगी- हे बहन, मैंवृहस्पतिवार का व्रतकर रही थी. तुम्हारी दासी मेरेघर आई थीपरन्तु जब तककथा होती है, तब तक तो उठते हैंऔर हीबोलते हैं, इसलिएमैं नहीं बोली. कहो दासी क्योंगई थी.
रानी बोली- बहन, तुमसेक्या छिपाऊं, हमारेघर में खानेतक को अनाजनहीं था. ऐसाकहते-कहते रानीकी आंखे भरआई. उसने दासीसमेत पिछले सातदिनों से भूखेरहने तक कीबात अपनी बहनको विस्तारपूर्वक सूनादी. रानी कीबहन बोली- देखोबहन, भगवान वृहस्पतिदेवसबकी मनोकामना कोपूर्ण करते हैं. देखो, शायद तुम्हारेघर में अनाजरखा हो. पहलेतो रानी कोविश्वास नहीं हुआपर बहन केआग्रह करने परउसने अपनी दासीको अन्दर भेजातो उसे सचमुचअनाज से भराएक घड़ा मिलगया. यह देखकरदासी को बड़ीहैरानी हुई. दासीरानी से कहनेलगी- हे रानी, जब हमको भोजननहीं मिलता तोहम व्रत हीतो करते हैं, इसलिए क्यों इनसे व्रत औरकथा की विधिपूछ ली जाए, ताकि हम भीव्रत कर सके. तब रानी नेअपनी बहन सेवृहस्पतिवार व्रत केबारे में पूछा. उसकी बहन नेबताया, वृहस्पतिवार के व्रतमें चने कीदाल और मुनक्कासे विष्णु भगवानका केले कीजड़ में पूजनकरें तथा दीपकजलाएं, व्रत कथासुनें और पीलाभोजन ही करें. इससे वृहस्पतिदेव प्रसन्नहोते हैं. व्रतऔर पूजन विधिबतलाकर रानी कीबहन अपने घरको लौट गई.
सातवें रोज बादजब गुरूवार आयातो रानी औरदासी ने निश्चयनुसारव्रत रखा. घुड़सालमें जाकर चनाऔर गुड़ बीनलाई और फिरउसकी दाल सेकेले की जड़तथा विष्णु भगवानका पूजन किया. अब पीला भोजनकहां से आएइस बात कोलेकर दोनों बहुतदुखी थे. चूंकिउन्होंने व्रत रखाथा इसलिए गुरुदेवउनपर प्रसन्न थे. इसलिए वे एकसाधारण व्यक्ति का रूपधारण कर दोथालों में सुन्दरपीला भोजन दासीको दे गए. भोजन पाकर दासीप्रसन्न हुई औरफिर रानी केसाथ मिलकर भोजनग्रहण किया.

उसके बाद वेसभी गुरूवार कोव्रत और पूजनकरने लगी. वृहस्पतिभगवान की कृपासे उनके पासफिर से धन-संपत्ति हो गया, परन्तु रानी फिरसे पहले कीतरह आलस्य करनेलगी. तब दासीबोली- देखो रानी, तुम पहले भीइस प्रकार आलस्यकरती थी, तुम्हेंधन रखने मेंकष्ट होता था, इस कारण सभीधन नष्ट होगया और अबजब भगवान गुरुदेवकी कृपा सेधन मिला हैतो तुम्हें फिरसे आलस्य होताहै. बड़ी मुसीबतोंके बाद हमनेयह धन पायाहै, इसलिए हमेंदान-पुण्य करनाचाहिए, भूखे मनुष्योंको भोजन करानाचाहिए, और धनको शुभ कार्योंमें खर्च करनाचाहिए, जिससे तुम्हारे कुलका यश बढ़ेगा, स्वर्ग की प्राप्तिहो और पित्तरप्रसन्न हो. दासीकी बात मानकररानी अपना धनशुभ कार्यों मेंखर्च करने लगी, जिससे पूरे नगरमें उसका यशफैलने लगा.

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