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Sunday, 25 November 2012

दुकान में शास्त्री जी



पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री कपड़ेकी एक दुकानमें साडि़यां खरीदनेगए। दुकान कामालिक शास्त्री जीको देख बेहदप्रसन्न हुआ। उसनेउनके आने कोअपना सौभाग्य मानाऔर उनका स्वागत-सत्कार किया। शास्त्रीजी ने उससेकहा कि वेजल्दी में हैंऔर उन्हें चार-पांच साडि़यांचाहिए। दुकान का मैनेजरशास्त्री जी कोएक से बढ़कर एक साडि़यांदिखाने लगा। सभीकीमती साडि़यां थीं।शास्त्री जी बोले- भाई, मुझे इतनीमहंगी साडि़यां नहींचाहिए। कम कीमतवाली दिखाओ। इसपर मैनेजर नेकहा- सर आपइन्हें अपना हीसमझिए, दाम कीतो कोई बातही नहीं है।यह तो हमसबका सौभाग्य हैकि आप पधारे।शास्त्री जी उसकाआशय समझ गए।उन्होंने कहा- मैंतो दाम देकरही लूंगा। मैंजो तुम सेकह रहा हूंउस पर ध्यानदो और मुझेकम कीमत कीसाडि़यां ही दिखाओऔर उनकी कीमतबताते जाओ। तबमैनेजर ने शास्त्रीजी को थोड़ीसस्ती साडि़यां दिखानीशुरू कीं। शास्त्रीजी ने कहा-ये भीमेरे लिए महंगीही हैं। औरकम कीमत कीदिखाओ। मैनेजर को एकदमसस्ती साड़ी दिखानेमें संकोच होरहा था। शास्त्रीजी इसे भांपगए। उन्होंने कहा- दुकान में जोसबसे सस्ती साडि़यांहों, वो दिखाओ।मुझे वही चाहिए।आखिरकार मैनेजर ने उनकेमनमुताबिक साडि़यां निकालीं। शास्त्रीजी ने उनमेंसे कुछ चुनलीं और उनकीकीमत अदा करचले गए। उनकेजाने के बादबड़ी देर तकदुकान के कर्मचारीऔर वहां मौजूदकुछ ग्राहक शास्त्रीजी की सादगीकी चर्चा करतेरहे। वे उनकेप्रति श्रद्धा सेभर उठे थे।


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